Wednesday, 25 January 2017

गणतंत्र दिवस : 26 JANUARY



भारत देश में गणतंत्र दिवस को हिंदी में पूर्त्य कुछ ही लोग जानते है इसका  वास्तविक नाम या तो 26 जनवरी या REPUBLIC DAY के नाम से जाना जाता है इसमें हमारा कोई दोष भी नहीं है क्योकि जब विद्यालयों में आज के समय पर पाश्चात्य सभ्यता के अनुरूप पढाई लिखाई और अन्य कार्य किये जा रहे है तो संभावित है की हम हिंदी को पूर्णतया या तो त्याग दे या अंग्रेजी को पूर्णतया अपना लें।
भारत में अंग्रेजी का प्रचलन प्रचलन 1857 की क्रांति के पश्चात अधिक हुआ उसके पीछे का कारण ये रहा की अंग्रेजो ने जब पहली क्रांति का दमन किया तब उन्होंने क्रांति होने के कारण का गहन किया और उस अध्यन्न का नतीजा  निकल  आया की जब इस क्रांति को करने के पीछे महीनो का कार्य था लेखको ने लेखों द्वारा ही भारत के लोगो में नई जान फूकि थी और अपनी कविताओ और भाषणों के द्वारा छोटे छोटे राजाओ पर व्यंग , कटाक्ष और मातृभूमि की दशा को बता कर उनके मन में क्रांति के भाव उत्पन्न कर दिए थे।
एक प्रकार से भारत में रहने वाले हर व्यक्ति को किसी न किसी प्रकार से क्रांति से भाषा के द्वारा जोड़ा जा रहा था तब अंग्रेजो ने अपनी रणनीति बदली और भारत से हिंदी को विलुप्त करने का अपना प्रयास आरम्भ कर दिया उस समय के एक अंग्रेज ने अपनी किताब में लिखा था की भारत को जब तक नहीं जोड़ा जा सकता जब तक की उसकी भाषा को नहीं जोड़ा जा सकता।
अपनी पहली रणनीति "फुट डालो राज करो" में सजग सफलता के बात अंग्रेजो ने दूसरी रणनीति पर काम करना आरम्भ किया और वो अपनी रणनीति में सफल भी रहे।
आज के भारत में अगर हम किसी भी प्रदेश में निकल जाये तो वहां पर पूर्णतय हिंदी बोलने और सझने वाले लोग नदारद है.
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली जैसे क्षेत्र में अंग्रेजी में बात करना एक आवश्यकता बन गई है और जैस हवा और पानी कोई भी व्यक्ति हिंदी में बात करना आज अपमान क्यों समझ रहा है ?
जापान,चीन,रूस,जर्मनी और फ्रांस जैसे विकसित देशो में अंग्रेजी की कोई भी पुस्तक पढ़ाना या फिर अंग्रेजी की तरफ कोई भी लुभावन होना बिलकुल नहीं है।
 जापान और चीन जैसे देशो में बच्चो को अंग्रेजी पढना गैर क़ानूनी है और ये देश अपनी संस्कृति के प्रति गौरवान्वित भी है। इन्हें गर्व है स्वयं के जापानी होने पर  और चीनी होने पर।
जापान के लेखक ने भाषा के विषय में कहा है की "यदि आप अपने देश को गौरवान्वित करना चाहते है तो अपने बच्चो को मातृभाषा की शिक्षा दीजिये अन्यथा वो कभी भी राष्ट्रभक्त नहीं बन पाएंगे। देश की आत्मा मातृभाषा में है उसका प्रयोग करें "

Tuesday, 24 January 2017

नरेंद्र तथा नरेंद्र मोदी


जीवन में कभी ऐसे क्षण आते है जो हमें सोचने पर विवश कर देते है की अगर ऐसा ऐसा किया होता तो आज में कहा पर होता।
ऐसे ही कुछ वृतांत कहे जाते है हमारे राष्ट्र नायक नरेंद्र मोदी के विषय में जो की आज के समय पर एक अति विलक्षण प्रतिभा के ज्ञाता है।
वाक्पटुता कुछ लोगो ने तो ऐसा शब्द भी नहीं सुना होगा लेकिन हिंदी भाषा के अंदर ऐसे शब्दो का भण्डार है। पुरातन काल से ही इस विधि का प्रयोग राजनायकों द्वारा किया जाता रहा है जो की हमारे पूर्व प्रधान मंत्री जी को नहीं आता था उन्होंने तो साक्षात् ये भी कह दिया था की "मेननू इंदी नी ओंदी सी" एक ऐसा अर्थशास्त्री जिसने अपने ज्ञान से भारत को मजबूती दी उसी ने राष्ट्र को एक गूंगापन भी प्रदान किया।
यहाँ नरेंद्र का अर्थ एक साधारण बालक से है जो की बाद में गुजरात का मुख्यमंत्री बन कर नरेंद्र मोदी बना उसके बाद भारत का प्रधान मंत्री बन वो मोदी बना। इस काल में उन पर काफी आरोपो का भी रोपण हुआ पर अभी तक की समाचार सूचनो के अनुसार तक तो उनके प्राणों की भी कोई संभावनाएं नहीं है
विरोधियो ने पास के शत्रु देशो तक से सहायता की गुहार कर ली है।मोसाद जैसे संगठनों ने भी भारत को इस विषय में सचेत किया है।अभी तो केवल 2019 की प्रतीक्षा है।
किसी भी कला में महारथ प्राप्त करने को पटुता कहा जाता है कुछ लोगो में ऐसा प्रतिभा जन्म से होती है और कुछ लोगो में ये प्रतिभा अभ्यास से आती है नरेंद्र मोदी के विषय में ये दोनों ही संभावित है। पहले वो संघ के प्रचारक रह चुके है तो संभावित है कई स्थानों पर उन्होंने अपनी सेवाएं भी दी होंगी और उन्ही से उन्हें कुछ अभ्यास भी आया होगा और उसके बाद वो मुख्यमंत्री भी रहे है जिसके लिए वो अत्यधिक लोगो से मिले-जुले होंगे ये अभ्यास का ही एक रूप है। यद्यपि हम किसी व्यक्ति से पहली बार मिलें परंतु उसी प्रकार के व्यक्ति से अगर हम पहले भी मिले है तो हम उस से बात करने में झिझक कम होगी ऐसा सामान्यतः INTERVIEW के समय पर देखा भी जाता है।
किसी ही देश का प्रधान सेनापति यदि वाक्पटुता में पारंगत नहीं होगा तो वो समस्याओ को सुलझा नहीं पायेगा उसके विपरीत उसके गलत शब्दो का चयन उसे समस्याओ में अधिक घेर सकता है प्रचीन समय से ही ऐसे लोगो को राजनयक बनाने की परंपरा रही है जैसे की बीरबल,मानसिंह,उदल और बाजिराओ बल्लाड।
ये सभी अपने शब्दो को संयम से प्रयोग करने में महारथी थे।
जीवन के अनुभव - छोटी उम्र में चाय बेचना माता को लोगो के घरो में बर्तन मांजते देखना और घर की गरीबी से बुरी हालात ये सभी चीजे किसी कमजोर ह्रदय वाले व्यक्त को तोड़ सकती है लेकिन जिनका ह्रदय फौलादी होता है वो इन्हें अपने राह की अड़चन की जगह साहस का औजार सझते है।
हिटलर ने एक समय दिवार को पोतते समय कहा था एक दिन में इस देश का राजा बनूँगा और उसने वो अपनी दृढ इच्छा शक्ति से कर दिखाया।
ऐसा ही मोदी जी के साथ भी था उन्हने कहने से अधिक करने पर भरोसा किया और आज के समय कर नोटबंदी का फैसला बिना किसी पूर्व न्योजित कार्यक्रम के कर दिखाना उनकी इच्छा शक्ति का ही प्रमाण है।

Saturday, 21 January 2017

उद्धव गीता



उद्धव बचपन से ही सारथी के रूप में श्रीकृष्ण की सेवा में रहे, किन्तु उन्होंने श्री कृष्ण से कभी न तो कोई इच्छा जताई और न ही कोई वरदान माँगा।
जब कृष्ण अपने *अवतार काल* को पूर्ण कर *गौलोक* जाने को तत्पर हुए, तब उन्होंने उद्धव को अपने पास बुलाया और कहा-
"प्रिय उद्धव मेरे इस 'अवतार काल' में अनेक लोगों ने मुझसे वरदान प्राप्त किए, किन्तु तुमने कभी कुछ नहीं माँगा! अब कुछ माँगो, मैं तुम्हें देना चाहता हूँ।
तुम्हारा भला करके, मुझे भी संतुष्टि होगी।
उद्धव ने इसके बाद भी स्वयं के लिए कुछ नहीं माँगा। वे तो केवल उन शंकाओं का समाधान चाहते थे जो उनके मन में कृष्ण की शिक्षाओं, और उनके कृतित्व को, देखकर उठ रही थीं।
उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा-
"भगवन महाभारत के घटनाक्रम में अनेक बातें मैं नहीं समझ पाया!
आपके 'उपदेश' अलग रहे, जबकि 'व्यक्तिगत जीवन' कुछ अलग तरह का दिखता रहा!
क्या आप मुझे इसका कारण समझाकर मेरी ज्ञान पिपासा को शांत करेंगे?"
श्री कृष्ण बोले-
“उद्धव मैंने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन से जो कुछ कहा, वह *"भगवद्गीता"* थी।
आज जो कुछ तुम जानना चाहते हो और उसका मैं जो तुम्हें उत्तर दूँगा, वह *"उद्धव-गीता"* के रूप में जानी जाएगी।
इसी कारण मैंने तुम्हें यह अवसर दिया है।
तुम बेझिझक पूछो।
उद्धव ने पूछना शुरू किया-
"हे कृष्ण, सबसे पहले मुझे यह बताओ कि सच्चा मित्र कौन होता है?"
कृष्ण ने कहा- "सच्चा मित्र वह है जो जरूरत पड़ने पर मित्र की बिना माँगे, मदद करे।"
उद्धव-
"कृष्ण, आप पांडवों के आत्मीय प्रिय मित्र थे। आजाद बांधव के रूप में उन्होंने सदा आप पर पूरा भरोसा किया।
कृष्ण, आप महान ज्ञानी हैं। आप भूत, वर्तमान व भविष्य के ज्ञाता हैं।
किन्तु आपने सच्चे मित्र की जो परिभाषा दी है, क्या आपको नहीं लगता कि आपने उस परिभाषा के अनुसार कार्य नहीं किया?
आपने धर्मराज युधिष्ठिर को द्यूत (जुआ) खेलने से रोका क्यों नहीं?
चलो ठीक है कि आपने उन्हें नहीं रोका, लेकिन आपने भाग्य को भी धर्मराज के पक्ष में भी नहीं मोड़ा!
आप चाहते तो युधिष्ठिर जीत सकते थे!
आप कम से कम उन्हें धन, राज्य और यहाँ तक कि खुद को हारने के बाद तो रोक सकते थे!
उसके बाद जब उन्होंने अपने भाईयों को दाँव पर लगाना शुरू किया, तब तो आप सभाकक्ष में पहुँच सकते थे! आपने वह भी नहीं किया? उसके बाद जब दुर्योधन ने पांडवों को सदैव अच्छी किस्मत वाला बताते हुए द्रौपदी को दाँव पर लगाने को प्रेरित किया, और जीतने पर हारा हुआ सब कुछ वापस कर देने का लालच दिया, कम से कम तब तो आप हस्तक्षेप कर ही सकते थे!
अपनी दिव्य शक्ति के द्वारा आप पांसे धर्मराज के अनुकूल कर सकते थे!
इसके स्थान पर आपने तब हस्तक्षेप किया, जब द्रौपदी लगभग अपना शील खो रही थी, तब आपने उसे वस्त्र देकर द्रौपदी के शील को बचाने का दावा किया!
लेकिन आप यह यह दावा भी कैसे कर सकते हैं?
उसे एक आदमी घसीटकर हॉल में लाता है, और इतने सारे लोगों के सामने निर्वस्त्र करने के लिए छोड़ देता है!
एक महिला का शील क्या बचा? आपने क्या बचाया?
अगर आपने संकट के समय में अपनों की मदद नहीं की तो आपको आपाद-बांधव कैसे कहा जा सकता है?
बताईए, आपने संकट के समय में मदद नहीं की तो क्या फायदा?
क्या यही धर्म है?"
इन प्रश्नों को पूछते-पूछते उद्धव का गला रुँध गया और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
ये अकेले उद्धव के प्रश्न नहीं हैं। महाभारत पढ़ते समय हर एक के मनोमस्तिष्क में ये सवाल उठते हैं!
उद्धव ने हम लोगों की ओर से ही श्रीकृष्ण से उक्त प्रश्न किए।
भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले-
"प्रिय उद्धव, यह सृष्टि का नियम है कि विवेकवान ही जीतता है।
उस समय दुर्योधन के पास विवेक था, धर्मराज के पास नहीं।
यही कारण रहा कि धर्मराज पराजित हुए।"
उद्धव को हैरान परेशान देखकर कृष्ण आगे बोले- "दुर्योधन के पास जुआ खेलने के लिए पैसाऔर धन तो बहुत था, लेकिन उसे पासों का खेल खेलना नहीं आता था, इसलिए उसने अपने मामा शकुनि का द्यूतक्रीड़ा के लिए उपयोग किया। यही विवेक है। धर्मराज भी इसी प्रकार सोच सकते थे और अपने चचेरे भाई से पेशकश कर सकते थे कि उनकी तरफ से मैं खेलूँगा।
जरा विचार करो कि अगर शकुनी और मैं खेलते तो कौन जीतता?
पाँसे के अंक उसके अनुसार आते या मेरे अनुसार?
चलो इस बात को जाने दो। उन्होंने मुझे खेल में शामिल नहीं किया, इस बात के लिए उन्हें माफ़ किया जा सकता है। लेकिन उन्होंने विवेक-शून्यता से एक और बड़ी गलती की!
और वह यह-
उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि मैं तब तक सभा-कक्ष में न आऊँ, जब तक कि मुझे बुलाया न जाए!
क्योंकि वे अपने दुर्भाग्य से खेल मुझसे छुपकर खेलना चाहते थे।
वे नहीं चाहते थे, मुझे मालूम पड़े कि वे जुआ खेल रहे हैं!
इस प्रकार उन्होंने मुझे अपनी प्रार्थना से बाँध दिया! मुझे सभा-कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी!
इसके बाद भी मैं कक्ष के बाहर इंतज़ार कर रहा था कि कब कोई मुझे बुलाता है! भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब मुझे भूल गए! बस अपने भाग्य और दुर्योधन को कोसते रहे!
अपने भाई के आदेश पर जब दुस्साशन द्रौपदी को बाल पकड़कर घसीटता हुआ सभा-कक्ष में लाया, द्रौपदी अपनी सामर्थ्य के अनुसार जूझती रही!
तब भी उसने मुझे नहीं पुकारा!
उसकी बुद्धि तब जागृत हुई, जब दुस्साशन ने उसे निर्वस्त्र करना प्रारंभ किया!
जब उसने स्वयं पर निर्भरता छोड़कर-
*'हरि, हरि, अभयम कृष्णा, अभयम'*-
की गुहार लगाई, तब मुझे उसके शील की रक्षा का अवसर मिला।
जैसे ही मुझे पुकारा गया, मैं अविलम्ब पहुँच गया।
अब इस स्थिति में मेरी गलती बताओ?"
उद्धव बोले-
"कान्हा आपका स्पष्टीकरण प्रभावशाली अवश्य है, किन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि नहीं हुई!
क्या मैं एक और प्रश्न पूछ सकता हूँ?"
कृष्ण की अनुमति से उद्धव ने पूछा-
"इसका अर्थ यह हुआ कि आप तभी आओगे, जब आपको बुलाया जाएगा? क्या संकट से घिरे अपने भक्त की मदद करने आप स्वतः नहीं आओगे?"
कृष्ण मुस्कुराए-
"उद्धव इस सृष्टि में हरेक का जीवन उसके स्वयं के कर्मफल के आधार पर संचालित होता है।
न तो मैं इसे चलाता हूँ, और न ही इसमें कोई हस्तक्षेप करता हूँ।
मैं केवल एक 'साक्षी' हूँ।
मैं सदैव तुम्हारे नजदीक रहकर जो हो रहा है उसे देखता हूँ।
यही ईश्वर का धर्म है।"
"वाह-वाह, बहुत अच्छा कृष्ण!
तो इसका अर्थ यह हुआ कि आप हमारे नजदीक खड़े रहकर हमारे सभी दुष्कर्मों का निरीक्षण करते रहेंगे?
हम पाप पर पाप करते रहेंगे, और आप हमें साक्षी बनकर देखते रहेंगे?
आप क्या चाहते हैं कि हम भूल करते रहें? पाप की गठरी बाँधते रहें और उसका फल भुगतते रहें?"
उलाहना देते हुए उद्धव ने पूछा!
तब कृष्ण बोले-
"उद्धव, तुम शब्दों के गहरे अर्थ को समझो।
जब तुम समझकर अनुभव कर लोगे कि मैं तुम्हारे नजदीक साक्षी के रूप में हर पल हूँ, तो क्या तुम कुछ भी गलत या बुरा कर सकोगे?
तुम निश्चित रूप से कुछ भी बुरा नहीं कर सकोगे।
जब तुम यह भूल जाते हो और यह समझने लगते हो कि मुझसे छुपकर कुछ भी कर सकते हो, तब ही तुम मुसीबत में फँसते हो! धर्मराज का अज्ञान यह था कि उसने माना कि वह मेरी जानकारी के बिना जुआ खेल सकता है!
अगर उसने यह समझ लिया होता कि मैं प्रत्येक के साथ हर समय साक्षी रूप में उपस्थित हूँ तो क्या खेल का रूप कुछ और नहीं होता?"
भक्ति से अभिभूत उद्धव मंत्रमुग्ध हो गये और बोले-
प्रभु कितना गहरा दर्शन है। कितना महान सत्य। 'प्रार्थना' और 'पूजा-पाठ' से, ईश्वर को अपनी मदद के लिए बुलाना तो महज हमारी 'पर-भावना' है। मग़र जैसे ही हम यह विश्वास करना शुरू करते हैं कि 'ईश्वर' के बिना पत्ता भी नहीं हिलता! तब हमें साक्षी के रूप में उनकी उपस्थिति महसूस होने लगती है।
गड़बड़ तब होती है, जब हम इसे भूलकर दुनियादारी में डूब जाते हैं।
सम्पूर्ण श्रीमद् भागवद् गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसी जीवन-दर्शन का ज्ञान दिया है।
सारथी का अर्थ है- मार्गदर्शक।
अर्जुन के लिए सारथी बने श्रीकृष्ण वस्तुतः उसके मार्गदर्शक थे।
वह स्वयं की सामर्थ्य से युद्ध नहीं कर पा रहा था, लेकिन जैसे ही अर्जुन को परम साक्षी के रूप में भगवान कृष्ण का एहसास हुआ, वह ईश्वर की चेतना में विलय हो गया!
यह अनुभूति थी, शुद्ध, पवित्र, प्रेममय, आनंदित सुप्रीम चेतना की!
तत-त्वम-असि!
अर्थात...
वह तुम ही हो।।

Tuesday, 10 January 2017

नरेंद्र मोदी : उत्तर प्रेदेश भाजपा


अभी उत्तर प्रदेश में राज्यसभा के चुनावो की जंग जारी है और इस दौड़ में 3 पार्टिया सबसे आगे हैं।
1.भाजपा
2.सपा
3.बसपा
तीनो के वोटो की संख्या इनके क्रमानुसार ही है यव तीनो ही दल उत्तर प्रदेश का भविष्य निर्धारित करेंगे इनके अन्यत्र कोई और दल उत्तर प्रदेश में नहीं आ सकता है कोंग्रेस का दमन तो लोकसभा के समय से ही हो चूका था अब तो बस वो एक निशान बन कर रह गई है कई क्षेत्रो में तो इन्हें अपनी जमानत भी बचानी भारी पड़ सकती है।
जिस प्रकार से आम आदमी पार्टी के कुमार विशवास ने अमेठी से जितने का दम भरा था और फिर वो अंत में जाकर अपनी जमानत भी न बचा पाये थे वाही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ होने वाला है।
भाजपा का जितना आवश्यक है क्योकि भाजपा के नेताओ की अब काम करने की इच्छा है और उत्तर प्रदेश ऐसा प्रदेश है जहा पर यदि कोई काम करता है तो उसे उसके अनुसार वोट भी मिलते है।
जैसा की पिछले चुमावो में देखा गया था की मायावती और अखलेश यादव ने जो भी कार्य किये थे सब अपनी बिरादरी के लिए किये थे।उत्तर प्रदेश में अखलेश यादव ने कोई ख़ास विकास तो किया नहीं क्योके वो भी मनमोहन सिंह की तरह ही कठपुतली है अपने पिताजी के और ये केवल दिखावे के मुख्यमंत्री है इनके सभी निर्णय दबाव में होते है और इन निर्णयों से जनता को अत्यधिक नुक्सान झेलना पड़ता है।
पिछले दिनों जब दुर्गा नागशक्ति जैसी IPS अफसर ने अवैध मस्जिद निर्माण पर रोक लगाई तो अखलेश यादव ने उनका हो तबादला करा दिया और उसकी जगह पर एक आलीशान मस्जिद का निर्माण सरकारी पैसे से करा दिया जिस प्रकार मायावती ने सरकारी धन का प्रयोग अपने स्वार्थ के लिए किया उसी प्रकार से अखलेश यादव अपनी वोटो में वृद्धि के लिए मुस्लिमो को लुभावन देने के लिए सरसरकारी खजाने का दुरूपयोग करते दिखाई दे रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में जब बसपा की सरकार थी तब भी स्वर्णो की वही हालत थी और जब सपा की सरकार आई तब स्वर्णो भी स्वर्णो की वही हालात है परंतु बसपा के आने पर दलितों को स्वर्ण जैसा अनुभव कर ही दिया था परंतु चार दिन की चांदनी कब तक टिक पाती?
सपा ने आते ही सबसे पहला काम दलितों को सभी उच्च सरकारी पदों से हटा कर उन्हें कही दूर भेज दिया और उन स्थानों पर यादवो की भर्ती आरम्भ कर दी और 5 वर्षो में सभी ऊँचे पदों पर यादवो का बोल बाला हो गया है ।
आज के समय पर उत्तर प्रदेश सरकारी विभाग जो यादवो का गढ़ माना जाता है में भाजपा का जितना चिड़िया की आँख में निशाना लगाने जैसा है।भले भी भाजपा नरेंद्र मोदी जी को अपना मुख्या चहरा बना कर चुनाव लड़ रही है परंतु इसमें भी जोखिम तो है ही ।भाजपा के लिए इस स्थिति में चुनाव के नतीजे अपने पक्ष में निकलने का एकमात्र साधन नरेंद्र मोदी जी ही है।
अगर लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखा जाये तो चुनाव के नतीजे भाजपा के पक्ष में अधिक है परंतु समय का फेरा बिहार की याद भी दिलाता है।

Thursday, 8 December 2016

ॐ (OM) उच्चारण के 11 शारीरिक लाभ

ॐ (OM)  उच्चारण के 11 शारीरिक लाभ :

ॐ : ओउम् तीन अक्षरों से बना है।
अ उ म् ।
"अ" का अर्थ है उत्पन्न होना,
"उ" का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास,
"म" का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् "ब्रह्मलीन" हो जाना।
ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है।
ॐ का उच्चारण शारीरिक लाभ प्रदान करता है।
जानीए
ॐ कैसे है स्वास्थ्यवर्द्धक और अपनाएं आरोग्य के लिए ॐ के उच्चारण का मार्ग...

● *उच्चारण की विधि*

प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं।

01)  *ॐ और थायराॅयडः*
ॐ का उच्चारण करने से गले में कंपन पैदा होती है जो थायरायड ग्रंथि पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

*02)  *ॐ और घबराहटः-*
अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ॐ के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं।

*03) *..ॐ और तनावः-*
यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।

*04)  *ॐ और खून का प्रवाहः-*
यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है।

*5)  ॐ और पाचनः-*

ॐ के उच्चारण से पाचन शक्ति तेज़ होती है।

*06)  ॐ लाए स्फूर्तिः-*
इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।

*07)  ॐ और थकान:-*
थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।

*08) .ॐ और नींदः-*
नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चिंत नींद आएगी।

*09) .ॐ और फेफड़े:-*
कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मज़बूती आती है।

*10)  ॐ और रीढ़ की हड्डी:-*
ॐ के पहले शब्द का उच्चारण करने से कंपन पैदा होती है। इन कंपन से रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है और इसकी क्षमता बढ़ जाती है।

*11)  ॐ दूर करे तनावः-*
ॐ का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव-रहित हो जाता है।
आशा है आप अब कुछ समय जरुर ॐ का उच्चारण करेंगे । साथ ही साथ इसे उन लोगों तक भी जरूर पहुंचायेगे जिनकी आपको फिक्र है ।
अपना ख्याल रखिये, खुश रहें ।

Saturday, 8 October 2016

नारायण का समर्पण

आज के समय पर किसी को भी भागवत कथा में रूचि नहीं रही परंतु उस से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों को पढ़ने का समय अवश्य है।
क्या प्रभु ने कभी किस के समक्ष समर्पण किया है ?
इसका जवाब है हाँ.... 
प्रभु ने तीन दैत्यों अथवा राक्षसों के समक्ष समर्पण किया है 
१. वानर राज बाली 
जैसा की सभी को पता है की बाली के पास ऐसी शक्ति थी जिस से उस के समक्ष खड़े योद्धा की आधी शक्ति उस में आ जाती थी तब श्री राम ने उसे मारने के लिए छिप कर तीर चलाया था।इसके बाद श्री राम जब बाली के समक्ष आये तब बाली ने मारने का कारण पुछा तो रामजी ने छोटे भाई का राज्य हथियाने और उसकी पत्नी को अपनी कैद में रखने का कारण बताया। तब बाली ने पुछा की ये नियम किसने किसके लिए बनाये ?
रामजी ने कहा ये नियम महर्षि मनु ने मनुष्यो के लिए बनाये। 
तब बाली ने कहा प्रभु में तो वानर हूँ मुझपर ये नियम कैसे लग सकते है ?

2. राजा बलि 
जब प्रभु ने वामन अवतार लिया और बलि से ढाई पग भूमि मांगी तब बलि ने बड़ी विनम्रता से कहा की वामन थोड़ा ज्यादा मानगो तब वामन देव ने कहा,नहीं इतना ही देदो। बलि ने कहा नाप लो किसी भी दिशा में ढाई  पग भूमि। प्रभु ने तभी विराट रूप धारण किया और १ पग में धरती दूसरे में आकाश नाप दिया फिर पुछा आधा पग कहां पर रखु  ?
बलि ने कहा प्रभु जब मांगे थे तब तो नन्हे नन्हे पग थे जब नापने लगे तब पग विराट कर लिए ये कहाँ का न्याय है ?
इस पर प्रभु ने कहा की न्याय नहीं है इसी लिए आज से तुम्हे में पाताल लोक का राजा बनाता हु। 

3 . कालिया नाग 

श्री कृष्णा बचपन में यमुना के किनारे खेलते थे एक बार जब खेलते हुए गेंद यमुना के पानी में गिर गई तब सबने कहा की इस गेंद को कोई नहीं निकलेगा क्योके यमुना में कालिया नाग रहता है और उसके विष से सब मर जाते है तब श्री कृष्ण गेंद निकलने यमुना में उतरे और कालिया नाग के सामने गए तो कालिया नाग ने उनपर भी विष से आक्रमण किया तब श्री कृष्णा ने कालिया को बंधक बना कर उसका फन कुचलने के लिए जैसे ही पग आगे बढ़ाये तब कालिया नाग की पत्नी आई और उसने कृष्णा जी से रुकने का आग्रह किया। 
कृष्णा जी ने रुक कर कहा की ये सभी को अपने विष का शिकार बनाता है इस लिए इसका मर जाना ही उचित है। 
तब कालिया नाग बोला की प्रभु ये सृस्टि आपकी रचना है इसमें जिसके पास जो भी है वो आपकी इच्छा से है मेरे मुख में विष भी आप ही की देन है यदि ये गलत है तो आपको मेरे मुख में अमृत देना चाहिए था तब में सभी पर अमृत की वर्षा करता। 
ये सुनकर श्री कृष्णा रुक गए और कालीया नाग को जाने दिया। 



















Saturday, 1 October 2016

ताशकंद धोखा

भारत ने अपने युद्धो के इतिहास में तीन निर्णायक युद्ध लाडे आई जिनमे से २ पकिस्तान से और एक चीन से लड़ा है। भारत का १९६५ का निर्णायक युद्ध जो की पकिस्तान की सेना का मानसिक संतुलन खो जाने के कारन से हुआ था और वो कुछ पकिस्तान को दिए अमेरिकी युद्धक टेंको की वजह से भी हुए थे। अमेरिका ने पकिस्तान को गरीब देश समझते हुए और एशिया महाद्वीप पर अपना कब्ज़ा करने के लिए पकिस्तान को सहायता करने का मन बना लिया था और उसी कारन उसने पकिस्तान को अपने युद्धक टैंक जो की उस समय पर किसी भी थल युद्ध को जितने में सक्षम थे।
भारतीय सेना का मनोबल तोड़ने के लिए केवल इतना ही काफी था युद्ध में पेटेंट टैंक का प्रयोग किया जा रहा है लेकिन हर हर महादेव के ललकारे लगा कर वाहेगुरु के खालसो ने ऐसा प्रचंड तांडव मचाया की पाकिस्तानी सेना के पाँव उखड गए और उन्होंने पेटेंट टेंक को केवल एक छल समझा और वहां से भाग खड़े हुए। 
इस यद्ध का एक और पहलु ये है की जिस स्थान पर युद्ध किया जा रहा था वहां पर एक प्राचीन मंदिर है जिसे "तनोट माता" का मंदिर कहा जाता है। इस मंदिर की विशेषता ये है की पकिस्तान ने यहाँ पर 3000 बम गिराए परंतु फट एक भी नहीं। इसे मात्र एक संयोग नहीं कहा कहा जा सकता। चमत्कार का अंत यही नहीं हुआ थार के उस रण छेत्र में जो घर मंदिर छेत्र में थे उन्हें भी कोई ज्यादा क्षति नहीं पहुची उसके बाद पकिस्तान के जिन सैनको ने सीमा पर पर भारत भूमि पर कदम रखा और माता के मंदिर की तरफ बढे वो सभी अंधे हो गए ऐसी किवदंती है। 
इस युद्ध में भारत में पकिस्तान के 90 टैंक उसकी जगह पर खड़े खड़े ही ध्वस्त कर दिए और 200 से अधिक सैनिको को युद्ध भूमि में मार गिराया। आज भी वो सभी पाकिस्तानी या यें कहे की अमेरिकी टैंक भारत की छावनियों में रखे हुए है और अमेरिका को भारतीय वीरता की गाथा सुना रहे है। 
ऐसा ही कुछ अवाक्ष विमानों के साथ हुआ था और अमेरिका को मुह की खानी पड़ी थी। 
युद्ध हथियारों से नहीं होसलो से जीते जाते है ये भारतीय सेना से दुनिया को दिखा दिया है। 
इसके बाद हुआ ताशकंद  समझौता जिसमे की पकिस्तान ने रूस की सहायता से भारतीय प्रधानमंत्री श्री लाल बहाद्दुर शास्त्री जी को ताशकंद में ही मरवा दिया। 
इसके बाद जब उनके शव को भारत लाया गया ता बिना किसी चिकित्सक जाँच के उनकी अन्तयेष्टि कर दी गई। 
क्या यह जानना उचित नहीं था की जो कारन रूस ने दिया है क्या वो सही है या उसमे कुछ खोट है ?
शास्त्री जी की पत्नी के अनुसार उनके शव का रंग नीला पड़ चूका था जो की जहर देने का मुख्य लक्षण है और यदि चिकित्सक जांच की गई होती तो उनके शव का रंग शायद और भी अधिक नीला पड़ सकता था। 
उनको हृदय घात समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद आया था जबकि ऐसा कोई करना नहीं था जिसकी वजह से उन्हें हृदय घाट हो सके न ही उन्हें कोई रोग था न ही उन्हें किसी भी प्रकार का मोटापा था और न ही उन्हें कोई परेशानी थी अगर वो ह्रदय से कमजोर होते तो युद्ध का नाम सुनते ही ह्रदय घात से पीड़ित हो जाते लेकिन कठिन परिस्तिथियो का सामना उन्होंने बचपन से किया था और गरीबी और भूख को उन्होंने पास से देखा था  स्वतंत्रता के लिए कई बार जेल भी गए थे और यातनाये भी भोगी  थी इसके बाद भी उन्हें हृदय घात नहीं हुआ।