Wednesday, 1 February 2017

संघ : सेवा तथा त्याग (भाग २ )


संघ ने अपने नियम और संयम से आज 5 करोड़ से अधिक संघी तैयार कर लिए है इन सभी को निर्देश और शाखा को सुचारू रूप से चलने के लिए शाखा प्रमुख का शांत और कड़े निर्णय लेने वाला होना अति आवश्यक है। कुछ कार्यो को करने के लिए आयु अत्यंत महत्वपूर्ण है जैसे की बैंको में शाखा प्रबंधक की आयु 35 वर्ष से अधिक होनी चाहिए उसी प्रकार से यहाँ पर भी कुछ चरणों के बाद ही शाखा का प्रबंधन दिया जाता है। आयु से सीधा तात्पर्य ये है की यदि कोई अत्यंत क्रोधी स्वाभाव का व्यक्ति आपके सम्मुख आता है और उसकी आयु अधिक है तो वह आपकी बातो को समझ पाने में असमर्थ  होगा और आपकी आयु कम समझ कर आपकी बातो को भी नहीं सुनेगा।


संघ में सभी प्रकार का प्रशिक्षण दिया जाता है लाठी से लेकर बंदूको तक का और ये सभी निशुल्क है।
इन सभी प्रकार के शस्त्रो का प्रयोग केवल तभी सिखाया जाता है जब व्यक्ति योग अभ्यास कर अपने चित्त को शांत कर लेता है और अपनी मानसिक प्रतिक्रियाओ पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है। यदि कोई व्यक्ति बिना योग अभ्यास के इनका प्रशिक्षण लेता है तो उस से समाज को हानि हो सकती है वह अपनी विद्या का प्रयोग किसी को हानि पहुचने या अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए भी कर सकता है।

संघ में इस विषय पर अत्यंत धयान दिया जाता है की यदि किसी भी स्वयं सेवक के साथ कुछ अशिष्ट या कोई अभद्रता होती है तो वह संयम रखे और संघ को सुचना देकर उसका क़ानूनी निपटारा हो अत्यंत ही विपरीत परिस्थितियों में ही वह हिंसा के मार्ग को अपनाये न की प्रत्येक परिस्थिति में।
सभी सेवको को सेवा करने का प्रशिक्षण दिया जाता है और सभी को संघ के अनेको कार्यक्रमो में सभी प्रकार के कार्यो में कुशलता से व्यावहारिक ज्ञान भी दिया जाता है।
राष्ट्र सेवा को सेवको के अंदर कूट कूट कर भरा जाता है किसी भी प्रकार की आपदा में चाहे वह प्राकृतिक हो या मानव निर्मित या कोई दुघटना उसमे संघ के कार्यकर्ताओ को कोई भी सेना या सुरक्षाबल सेए से नहीं रोकता।
आपदा प्रबंधन,स्वयं सुरक्षा तथा नारीसम्मान संघ के सेवक को अति सूक्षमता से सिखाया जाता है और प्रत्येक संघ कार्यरत को को इन्हें अपने जीवन में वास्तविकता से उतारने के कड़े नियमो का पालनभी कराया जाता है। 

Monday, 30 January 2017

संघ : सेवा तथा त्याग



संघ का पूर्ण नाम रसिया स्वयं सेवक संघ है इसे RSS के नाम से अधिक जाना जाता है। संपूर्ण विश्व में ये सबसे बड़ी सेवा प्रणाली है जो की बिना किसी वेतन के देश सेवा और समाज कल्याण के कार्यो में कार्यरत है। इनका मुख्य कार्य दैनिक प्रतिदिन की दिनचर्या को सुगम बना प्रत्येक जन को निरोगी बनाना है और एक शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण करना है। प्रत्येक दिन का आरंभ संघ में सुबह की वंदना से होता है वंदना में भारत माता को साक्षी मान कर यह वचन लिया जाता है की एक संघी भारत में रहने वाले प्रत्येक बंधू का सहयोग निष्काम भाव से करेगा और यदि किसी भी बंधू पर कोई विपत्ति आती है तो वह उस समय सहयोग करेगा। संघ के लोग किसी भी जाती या भरम को बड़ा या छोटा नहीं मानते ये सभी का स्वागत खुले मन और विचारो से करते है। इनकी दैनिक रीती वैदिक पद्धत्ति से होने के कारन विरोधी जन इन्हे कुछ ज्यादा पसंद नहीं करते परन्तु अपने लाखो विरोधी होने के बाद भी संघ ने देश को अत्यंत ही महानुभाव लोग दिए है।  राष्ट्र सेवा संघ की विरासत है संघ का निर्माण करने के पीछे उद्देश्य भी यही था की राष्ट्र हित में यदि कोई असामाजिक शक्ति अपना वर्चस्व दिखा कर गैर संविधानिक गतिविधियों पर जोर देती है उसका दमन करने के लिए संघ संविधानिक तरीके से अग्रसर रहेगा। संघ में दैनिक वंदना के पश्चात व्यायाम किया जाता है जो शारीरिक बल में वृद्धि के लिए है और उसके पश्चात खेलो का आयोजन होता है। खेलो के बाद दैनिक विषयो पर वार्तालाप की जाती यदि किसी को कोई मुश्किल है या किसी प्रकार का कष्ट है तो उसके निवारण के उपाय के विषय में सभी के द्वारा उनकी प्रतिक्रिया देखि जाती है। स्वतंत्रता सेनानियो और हमारे पूर्वजो के द्वारा दिए गए योगदान के विषय में चाचा की जाती है और १ घंटे की इस प्रक्रिया के बाद सभी जन अपने निवास स्थान के लिए प्रस्थान करते है यह कहकर की कल फिर मिलेंगे और भारत को स्वस्थ और सदृढ़ बनाएंगे।
भारत में किसी भी प्रकार की आपदा आने पर संघ के कार्यकर्ता बिना किसी निमंत्रण के अपना सहयोग देने पहुच जाते है चाहे वह रेल दुर्घटना हो या बूम विस्फोट या उत्तराखंड में आए बढ़ त्रासदी संघीय ने अपनी सेवा का परचम सुनामी तक में दिखाया है अपने जीवन की चिंता किये बिना ये एक प्रचारक के रूप में अपना पूरा जीवन अपने घर से दूर और अपने सेज सम्बन्धियो से धूर रह कर भी व्यतीत कर देते है। कुछ क्षेत्रो में संघ की सेवा से इतनी ग्रहण है की वह पर प्रचारको की हत्या भी करा दी गई है। संघ किसी भी धर्म या समुदाय के प्रति घृणा का भाव नहीं रखता परंतु संघ की सेवाओ से संघ के बढ़ते वर्चस्व को देख कर असामाजिक तत्वों ने इन्हें निशाना बनाना आरम्भ कर दिया है। केरल में कुछ मिशनरियो के द्वार ये अधिक है और कर्णाटक में यह अत्यधिक है. . . . . . . . . . . .

शेष भाग २

Saturday, 28 January 2017

मृत्यु शैय्या पर भीष्म


पितामहः भीष्म जब इच्छा मृत्यु का प्रण लेकर मृत्यु शय्या पर अपनी मृत्यु को रोक कर लेते हुए  थे उस समय पर भीष्म के मन में यह बात कोंध गई की मेरी इस गति का कारण क्या है?
यद्यपि मैंने इस जनम में कोई गलत कार्य नहीं किया और ना ही गलत का साथ दिया वह तो केवल अपने वचन की बाध्यता को निभा रहे थे।
फिर भी उन्होंने अपने ज्ञान से यह पता लगा लिया की कोई भी बुरा कर्म उन्हें ऐसी मृत्यु नहीं दे सकता है अवश्य ही कोई पिछले जन्म का कर्म था जो उन्हें इस अवस्था में लाया है।
जिस प्रकार से उन्होंने अपने तपोबल से रणभूमि में श्री हरि के  विराट रूप को देखा था
उसी तपोबल के प्रयोग से वो अपने पूर्व जन्मों के कर्मो को देखने में सक्षम थे।
सक्षम होना ही काफी नहीं था उनकी जिज्ञासा ही ऐसी एकमात्र वस्तु थी जिसने उन्हें पूर्व जनम देखने को विवश किया।
अपने अंतिम समय में उन्होंने सभी को ज्ञान दिया और अपने पापो को गिना यही उनके जीवन का सार है जब उन्होंने अपने कर्मो का संज्ञान लेना आरम्भ किया तब उन्हीने पाया कि कोई भी ऐसा कर्म नहीं था जिसके कारण उन्हें ऐसी गति प्राप्त हो न ही ऐसा जोई शाप लगा जिस से उन्हें मृत्यु के इतना निकट रहते हुए भी प्राण त्यागने की अनुमति ना मिले ।
स्वर्ग में स्थित शांतनु की दिव्य आत्मा ये सब देख कर रुंध गई थी और उन्होंने स्वर्ग के सभी भोग विलास ऐश्वर्या को त्याग करना आरम्भ कर दिया था और स्वयं को कोसने लगे थे की क्यों उन्होंने भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान दिया?
जिस पुत्र ने अपने पिता के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत धारण किया और राज पाठ का त्याग तक किया उस पुत्र को दिया हुआ वरदान आज शाप क्यों बन गया?जन्मो तक देख आये और थक कर स्वयं को कोसने लगे की ऐसी क्या भूल हुई के ये गति प्राप्त हुई है।
तभी जगतगुरु श्री कृष्णा का वहाँ आना होता है
प्रिय प्रभु भीष्म का मुख देख कर ही जान लेते है की उनके मन की क्या जिज्ञासा है ?
भीष्म कहते है की प्रभु ऐसी क्या गलती हुई की मुझे इस जन्म में ये गति प्राप्त हुई है ऐसा कोनसा पाप कर्म हुआ है जिसके कारण मुझे मेरे पोत्र के द्वारा ही बाणों से बिंध दिया गया गया ?
तब श्री कृष्णा ने कहा की आप अपने पूर्व जन्मो को देखने में  सक्षम है आप खुद ही देख लीजिये।
भीष्म ने कहा की मैंने अपने पिछले 100 जन्मो को देख लिया है परंतु कोई ऐसा पाप दिखाई नहीं दिया जिस कारण ये दशा प्राप्त हो।
कृष्णा जी  ने एक जनम और देखने का आग्रह किया और भीष्म ने देखा की पूर्व जन्म में वह एक प्रजाप्रिय राजा थे और उनका रथ राज्य के भर्मण के लिए जा रहा था तभी एक सैनिक आकर यह बताता है की राह में एक सर्प घायल अवस्था में पड़ा है और यदि हम आगे बढे तो उसकी मृत्यु का पाप हमें लगेगा।
राजा ने सर्प को उठा कर निकट की झाड़ियो में फेकने का आदेश दिया जिस कारन सर्प निकट की झाड़ियो में काँटों के ऊपर गिर गया और काँटों से बींधने से उसके प्राण पखेरू उड़द गए।
ये देख भीष्म के नेत्र खुलते हैं और एक प्रश्न प्रभु की और कहते है कि वो पाप तो अनभिज्ञता वश हुआ है उसका ऐसा परिणाम क्या उचित है?
प्रभु ने कहा कि पाप कितना ही छोटा क्यों न हो उसका परिणाम किसी न किसी जन्म में भुगतना पड़ता है तुम्हारे पुण्यकर्मों ने उन दंड को 100 जन्मो तक दूर रखा परंतु अंततः उसका परिणाम भुगतना ही पड़ा।
अपने कर्मो से कही नहीं भागा जा सकता है यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो उसके कर्म उसे और अधिक तीव्र गति से उसके पीछे आते हैं।
परमपिता ब्रह्माजी ने सभी मनुष्यो के आगे आने वाले जन्मो का जीवन उनके पिछले जन्मो के आधार पर रखा है यदि आप इस जन्म में दिव्य कर्म करेंगे तो अगले जन्म में आपका जीवन भी दिव्य होगा।

अनन्ता वे वेदा - वेद अनंत है


वेदों के विषय में आज के समय पर सभी का ज्ञान अधूरा सामान है और भारत में ये ज्ञान लगभग विलुप्त होने की राह पर है जिन वेदों ने पवन यान जलपोत और ब्रम्हास्त्र जैसी महान शक्तियों का उद्गम किया आज वही स्वयं विलुप्ति की कगार पर खड़े है।
एक अंग्रेज ने अपनी दैनिक पुस्तिका में लिखा था की राईट बंधुओ को हवाई जहाज बनाने की विधि वेदों से प्राप्त हुई थी और स्वयं भारतीय वैज्ञानिक डॉक्टर कलाम का कहना था की वेदों की बाते किसी पहेली की तरह लिखी गई है जिस से उन्हें कोई आसानी से न समझ सके।
आज पूरे विश्व के लिए " वेद " एक आश्चर्य की बड़ी पहेली बने हुए है।। वे क्या है, कितने है, उसकी रचना और संग्लन किस प्रकार किया, उनका विषय क्या है, वेदों का नाम लेते ही ऐसे प्रश्न तो सामने आते ही हैं।। जैसे ईश्वर की ही एक अबूझ पहेली हो वेद ।।
आखिर वैद है क्या??
"इस विराट विश्व की समूची सर्वांगीण यंत्रणा का ज्ञान भंडार ही वेद है "। अनन्ता वे वेदा : ऐसा वचन है ।।
इस विराट विश्व के कर्ता धर्ता, और निर्माता जो ईश्वर अर्थात  देव है , उन्ही के द्वारा यह वैद नामक ज्ञान भंडार मानव को प्राप्त हुआ है ।
कुछ लोग यह सोचते है, इस आद्यत्मिक किताब को इतिहास में क्यों स्थान दिया गया, तो ज़रा तो एक बात पर विचार करे, अनन्त कोटि ब्रह्मांड वाला यह असीम विश्व क्या अपने आप में एक चमत्कार नहीं है ? अंतरिक्ष में निराधार गोल घूमने वाली पृथ्वी को हम स्थिर और समतल समझकर जीवन बिताते है, क्या यह चमत्कार नहीं ?? जब ऐसे चमत्कारी विश्व का इतिहास ही हम लिखते है, तो सबसे पहले वेदों के अलावा और चर्चा किसी की, की भी कैसे जा सकती है ?
मगर सिर्फ इतना कहने से काम चलेगा??? नहीं, हमें और तर्क देने होंगे ।।
देव और वेद
देव और वद इन दो शब्दों पर कुछ समय के लिए धयान केंद्रित कीजिये, दोनों ही एक दूसरे के पूरक है, दीव यानि प्रकाशमान, देव वे होते है, जो स्वम् प्रकाशमान या ऊर्जा की भांति स्वम् चेतना के पुंज होते हैम देवदत्त ज्ञान भंडार - यानि वेद । अतः जो भी ज्ञानतेज जो देवो में है, उन्हें लिखित रूप से वेदों में उतारा गया है ।।
वेद हर किसी को क्यू समझ में नहीं आते ?
हाँ , यक़ीनन यह ज्ञान का भंडार है, और यह समझ में भी नहीं आते , यह सुनकर आपको थोड़ा आश्चर्य हुआ होगा, किन्तु इसमें आश्चर्य जैसी तो कोई बात नहीं, यंत्र की रचना और कार्यतंत्र को प्रस्तुत करने वाली पुस्तिका सबके समझ के बाहर होना स्वाभाविक सी बात है।। आप टीवी अपने घर लाते है, तो क्या उसे खोल के देखते है? कि वो कैसे बना, क्या क्या तकनीक इस्तमाल हुई आपको मतलब सिर्फ टीवी देखने से होता है, इसी तरह हम मान बैठे है, की वेद ज्ञान का भंडार है, बिना पढ़े ही ।। जब स्वमं आप ईश्वर का तेज पाने निकालते हो तो उसके लिए आपको सब कुछ समर्पण तो करना ही होगा, ईश्वर से मिलन के लिए नहीं, उनके जैसी श्रेष्ठता हासिल करने के लिए ।। आर्यो को ईश्वर ने अपना पुत्र कहा है, और कौन पिता नहीं चाहेगा, की उनके पुत्र उनसे आगे ना निकले इसी लिए वेदों की रचना भी हुई।

अगर वेदों का ही ज्ञान चाहिए तो, सबसे बड़ी शर्त यह है, एक ज्ञानपिसाचु व्यक्ति योगी भी होना चाहिए, जो कुछ समय के लिए ही क्यू ना हो, इस जड़ जगत की सारी चिंताओ और व्यवधानों को भूलकर वैदिक रचनाओं के चिंतन में तल्लीन और समाधिस्त हो सके ।।

आइये ।।। वेदों की और फिर से लौटे

वेद को पढ़ने का आदेश स्वमं परमपिता परमेश्वर का है ।।

महाभारत तक तो सारा विश्व ही वेदों का पाठ करता था । युद्ध के बाद इसके घटते स्वर सिर्फ भारत तक रह गए, भारत की भूमि का कुछ भाग मुसलमान खा जाने के बाद यह लघुभारत रह गया है।। और यहाँ लघुभारत में में भी वेदों की पठन की व्यवस्था नहीं की गयी । जबकि पीढ़ी दर पीढ़ी अपने कुटुंब को वेद पढ़ाने की परंपरा हमारे समाज में थी ।। वेदों से ज्ञान प्राप्त करने वालो का रहन सहन बहुत सादा था , आज भी हम हिन्दू वेद पठन को बड़ी सुद्धता से और निस्वार्थ भाव से इसका पठन करते है , और उसी परंपरा को चला रहे हैं ।।। क्या यह चमत्कार नहीं है ??

भारत में जब अंग्रेजो का प्रभुत्व था, तो यूरोपीय गोरे पादरियों ने वेदों का अनुवाद कर सारे अर्थो का अनर्थ कर दिया, वेदों का अनुवाद तो किसी भाषा में नहीं किया सकता, क्यू की एक एक संस्कृत विविध अर्थ अनुवाद करने पर वह लुप्त हो जाएंगे, और मुर्ख गोरो ने वेदों के अनुवाद को बच्चो का खेल समझ लिया । उन अधर्मियों की बातें आज भी सच्ची मानकर हमारा समाज वेदों से दूर हो रहा है ।। उन्ही की तरह हमारे आर्य भी खुद को दलित या अन्य किसी का अनुयायी बताकर खुद को राक्षसों की टोली में शामिल कर रहे है।।

Friday, 27 January 2017

दाह संस्कार क्यों आवश्यक है ?

हिन्दू पद्धत्ति के अनुसार मनुष्य के मरने के पश्चात उसके पार्थिव शरीरी को अग्नि के सुपुर्द कर उसे नाशवान किया जाता है कुछ जिज्ञासुओ का ये मनना है की ऐसा करना गलत है और ऐसा करने से कोई लाभ नहीं है। परंतु ऋषियों - मुनियो की इस भूमि को उनके कुतर्कों की कोई आवश्यता नहीं है पुरातन समय से हमारे पूर्वजो ने हमारी दिनचर्या में ऐसी आदतों को गढ़ा है जिसने आज हम अंधविश्वास कह कर टाल देते या कुतर्कों से उनका खंडन किया जाता है। समय जानो को इन बातो का ज्ञान न होने के कारण उन्हें अपने धर्म के मार्ग पर चलने में या तो कठिनाई होती है या फिर वो धर्म के विषय में चर्चा करने से घबराते है।
विषय है की अंतिम संस्कार दाह संस्कार ही क्यों है ?
जल में प्रावह कर या भूमि में दबा कर भी किया जा सकता है।
 तर्क यह है की यदि हम जल में शव को प्रवाहित करेंगे तो जल दूषित होगा तथा यदि हम भूमि में दफ़न करेंगे तो भूमि दूषित भी होगी और एक समय ऐसा आएगा की सभी जगह शवो का ढेर बना होगा इस करण शव् को जलना ही उचित है परंतु जलने का अर्थ मिटटी तेल या कोई और ज्वलनशील पदार्थ से जलने से नहीं है।
कई बंधू लोग अंतिम संस्कार रीती में गए होंगे उन्हें पता होगा की शव् को जलाते समय उसपर काफी प्रकार की सामग्रियों का डाल कर दाह क्रिया को संपन्न किया जाता है  सभी सामग्रियों का प्रयोग वातावरण को शुद्ध करने के लिए किया जाता है जिस से आस पास की वायु को नुक्सान ना हो वायु प्रदुषण ना हो।

हम सभी परमेश्वर को "भगवान्" के नाम से जानते है यदि इसका संधि विच्छेद किया जाये तो हमें एक शब्द भ+ग+व+आ+न  प्राप्त होगा ये वही पञ्च तत्त्व है जिनसे हमारे भौतिक शरीर का निर्माण हुआ है।
भ से भूमि,ग से गगन,व से वायु, आ से आकाश और न से नीर मरणोपरांत हमारे शरीरी को इन्ही पञ्च तत्वो में विलीन किया  जाता है।

अग्नि,वायु,आकाश तथा भूमि तो हमें दाह संस्कार से मिल जाती ही  तथा उस से जगत का कल्याण वायु की शुद्धि कर किया जाता है अंतिम चरण होता है अवशेषो को जल में विलीन करना जो राख और हड्डिया पानी में डाली जाती है  उन से पानी में कैल्शियम  कमी दूर होती है और राख पानी में मिलने से जिस भी खेती की भूमि में जाता है वह भूमि उपजाऊ होती है।
पानी में कैल्शियम की वृद्धि से मछलिया ज्यादा होती है और जलचर प्राणी वृद्धि करते है जिस से जल का शुद्धिकरण होता है मछलिया जल की गन्दगी को ग्रहण  जिस  मल का त्याग करती है उस से जल की वनस्पति को खाद प्राप्त होती है।
दाह के समय जिन जड़ी-बूटियों का प्रयोग किया जाता है उनसे बदलो में भारीपन होता है और वो बरसने के लिए त्तपर होते है आज के समय पर कृत्रिम वर्षा भी इसी ज्ञान को धयान में रख कर कराइ जाती है।





Thursday, 26 January 2017

विश्व नायक (नरेन्द्र मोदी अथवा डोनाल्ड ट्रम्प)

आज के समय पर विश्व पटल पर 2 ही नामो की केवल चर्चा है और वो दोनों राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाले शक्तिशाली व्यक्ति है। भारत को एक दब्बू देश से एक सिंह की दहाड़ बनाने वाले देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का अत्यंत ही महत्वपूर्ण योगदान है यदि भारत आज के समय पर विश्वगुरु बनाने की हुंकार भारत है तो उसका श्रेय केवल मोदी जी को जाना है। अमेरिका से सम्बन्ध पहले से अधिक अच्छे बनाने ओ बराक ओबामा को अपने छोटे भाई की तरह स्नेह से गले लगाने वाले प्रधान मंत्री भारत के ही है उनके अन्यत्र कोई भी ऐसा नहीं है जिसने अमेरिका के राष्ट्रपति को निकट से स्पर्श करने का भी प्रयास किया हो। 
आर्थिक मंदी  के समय भारत में आने का बराक ओबामा का निर्णय अपने नागिको के लिए सहूलियत प्राप्त करना था की उनके व्यवसाय को कोई हानि नहीं होगी और न ही उन्हें नोकरियो से  निकाला जायेगा परंतु अभी उनके भारत आने का अर्थ आर्थिक नहीं मानसिक था। मित्रता के लिए ओबामा ने  1 वर्ष में 2 बार भारत की राजनितिक यात्रा की और मोदी जी के साथ बैठकर चाय की चुस्कियो से साथ ठहाके भी लागए। 
परन्तु अब समय बदल चुका है अब समय ट्रम्प का है जो दिन प्रतिदिन और भी शक्तिशाली होता जा रहा है अमेरिका ने अपनी जो साख खो दी थी एक गरम रवैये वाले देश से नरम रवैये वाला देश बन गया था वह अब वापस आ रही है ट्रम्प का सीधे शब्दो में मुस्लिम समुदाय को चुनोती देना और गैर अमेरिकी नागरिको को धमकाना साफ़ कर देता है की ये एक कठोर फैसले लेने वाला राष्ट्रपति है इनसे कोई अपनी गलतियों को क्षमा के भूल न ही करे तो ठीक होगा। 
जिस प्रकार से ट्रम्प ने अपने भाषणों में भारत और हिंदुत्व की विवेचना की थी उस से देख कर तो यही प्रतीत होता है की भारत की तरफ अमेरिका का रवैया अभी भी मित्रता वाला रहेगा और पकिस्तान को अभी अपने कान खीचने में भी भलाई है अन्यथा जिस प्रकार रूस प्रत्येक दिन आतंकियों का सफाया कर रहा है उसी अकार से कही एक दिन ऐसा ना आ जाये की पकिस्तान को अमरीका अपने कब्जे में कर वहां पर एशिया महाद्वीप कर नजर रखने वाला क्षेत्र बना दे ऐसी पेशकश वो भारत को भी दे चुका है क्योके उसे ज्ञात है की चीन एक बड़ा प्रतिद्वंदी है हथियारों में अमेरिका का और उसपर कब्ज़ा करना इतना सरल नहीं है न ही क्षेत्रफल से न ही बल से। 

Wednesday, 25 January 2017

गणतंत्र दिवस

भारतीय  संविधान २६ जनवरी १९५० को भारत में लागु  हुआ। 
 संविधान सभा ने संविधान को २ वर्ष ११ माह १८ दिन अर्थात सितंबर १९५० को ही संविधान बनकर तैयार हो गया था परंतु उसे लागु करने में इतना समय क्यों लगा ?
इसका उत्तर हमारे इतिहास में छिपा है। स्वतंत्रता संग्राम के समय पर भारतीय स्वतंत्रता सेनानियो ने २६ जनवरी १९४७ के दिन को स्वतंत्र भारत का दिन घोषित किया था परंतु इस दिन भारत को स्वतंत्रता करा पाना संभव ना हो सका और भारत को अंग्रेज मुक्त १५ अगस्त १९४७ को कहा गया। ऐसी स्तिथि में स्वतंत्रता दिवस को २६ जनवरी तक लेकर जाना संभव नहीं था इसी कारण से भारत के संविधान को इस दिन लागु किया गया। 
संविधन लागु करने का सीधा तात्पर्य ये था की जो क्रांतिकारियों द्वारा दिन का महत्त्व रखा गया था उस दिन का महत्त्व आगे भी बना रहे। 
इस दिन राजपथ पर शौर्य प्रदर्शन किया  जाता है जो यह दर्शाता है की अब हम अपनी शक्ति को सही रूप से प्रदर्शित करने में सार्थक है केवल शक्ति होना ही प्रयाप्त  का सही प्रयोग भी  आवश्यक है। 
 भारतीय सेना किसी भी सेना से यदि युद्ध  करती है तो युद्ध के उपरांत विपरीत सेना के शवो को आदरपूर्वक विपरीत देश को सोंपा जाता है ये युद्ध की नीति है की किसी भी सैनिक के पार्थिव शरीर का अपमान न हो। 
"हिटलर में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय कहा था की यदि जर्मनी के पास भारतीय सेना होती हो में इस युद्ध का निर्णय जर्मनी के पक्ष में होता"
कारगिल युद्ध के समय भारतीय सेना की "राजपूत रेजिमेंट"का शौर्य देखते ही बनता था जब अपने से अत्यधिक मजबूत स्थिति में बैठी पाकिस्तनि सेना को उन्होंने पहाड़ी के ऊपर जाकर भी मार था और भागते हुए पाकिस्तानी सैनिको को ये कहकर नहीं मारा था की हम भगोड़ो से युद्ध नहीं करते। 
चीन युद्ध के समय जब भारतीय सेना के पास हथियार नहीं पहुच पाए थे उस समय पर सेना ने अत्यंत शोर्य दिखाते हुए  आगे बढ़ कर अपनी बंदूको को तोड़ कर फेक दिया और बन्दूक की संगीनों को निकाल कर २०-२० चीनियों को ईश्वर के निकट भेज वीरगति को प्राप्त किया उस समय चीन अमेरिका और रूस के दर से कम भारतीय सेना की वीरता से अधिक थरथरा उठा था और अपने कदमो को भारत में आने से रोकने पर विवश हो गया था।